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कुछ समय किसी दूसरे के हालात में स्वयं को रखकर देखें – Walk a Mile in Someone Else’s Shoes (in Hindi)

कुछ समय किसी दूसरे के हालात में स्वयं को रखकर देखें

  • 12 Jul 2018
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स्वयं किसी दूसरे के हालात का अनुभव किये बिना यह जानना, महसूस करना और समझ पाना वास्तव में बहुत कठिन है कि वह किस परिस्थिति से गुज़र रहा है । अगर हमने ऐसा किया भी तो अनुभव वैसा नहीं होगा । लेकिन अगर हम रूक कर समझने का प्रयास करें, और उसके प्रति थोड़ी सहानुभूति रखें तो हम उसके प्रति राय बनाने और आलोचना करने में जल्दबाज़ी नहीं करेंगे ।


हरेक मनुष्य परिस्थितियों को अपने विचारों, भावनाओं और यादों के अनोखे लेंसों के माध्यम से देखता है । जीवन के प्रति हरेक की प्रतिक्रिया भिन्न होती है । इसलिए जीवन में यह उचित नहीं है कि हम इस आधार पर राय बना लें कि दूसरे क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं, या उन्हें क्या करना चाहिए । सम्भवतया हम कभी यह समझ नहीं पाऐंगे दूसरे जो कुछ कर रहे हैं वे ऐसा क्यों कर रहे हैं ।

हम में से हर कोई अपने साथ बहुत सा बोझा उठा कर चलता है, और आत्मा में बहुत कुछ जमा होता रहता है और हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है । आवश्यक नहीं है कि वर्तमान पल में जो कुछ घटित हो रहा है हम उसके लिए ही प्रतिक्रिया दे रहें हों, हम हमारे लम्बे भूतकाल के अनुभवों के आधार पर क्रियाशील/ प्रतिक्रिया/ अत्याधिक प्रतिक्रिया दे रहे होते हैं । जो एक से अधिक जन्मों में विश्वास करते हैं तो, और अधिक बोझ होने की सम्भावना के बारे में विचार करना होगा!
चलिए कुछ उदाहरण देखते हैं । जब तक आप माँ नहीं बनीं हैं तब तक माँपन की मुश्किलों को आप नहीं जान पाऐंगीं । बच्चे को जन्म देने की पीड़ा, अनिद्रा से भरी रातें, बेहिसाब त्याग और बच्चे के शरारती व्यवहार के बावजूद माँ अनवरत प्रेम और करूणा बरसाती रहती है ।


एक स्तर पर, यह समझना मुश्किल है कि छोटी उम्र में सारे बाल सफेद होने का अनुभव कैसा होगा (अगर आपके हैं तो आप निस्ंसदेह जान पाऐंगे!) और स्वयं को बहुत ऊँचे स्वाभिमान में रखना पड़ता है जब लोग आपको ‘आँटी’ कहते हैं लेकिन अंदर से आप स्वयं को जवान और केवल बीस का महसूस करते हो!
और पूर्णतया दूसरे स्तर पर, जब तक सम्पूर्ण रूप से हम उनकी वास्तविकता को नहीं जी रहे तब तक हमें उन लोगों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं हैं जो युद्ध-ग्रस्त देशों से भाग रहे हैं, या कैंपों में अमानवीय हालात में फँसे हैं । यह इस प्रकार की हालत है कि जिसे सच्चे मायने में कोई नहीं समझ सकता जब तक हम स्वयं उससे पार नहीं हुए हैं । भय, अकेलेपन और अस्वीकृति का दर्द, नृशंस युद्ध का सदमा, और अपने प्रियजनों के बिछड़ने का दर्द जो कि हम में से अधिकतर के लिए अकल्पनीय है जिन्होंने इसका अनुभव नहीं किया हुआ ।


जब धारणा बनाने की बात आती है तो, अक्सर हम दूसरों के प्रति भयवश या अज्ञानतावश धारणा बनाते हैं । हम स्वयं के प्रति भी धारणा बनाते हैं, कभी कठोरतापूर्वक, और यह समान रूप से हानिकारक है । एक पहलू है कि आपके लिए बनाई गई धारणा का सामना करना, और दूसरा है जब हम दूसरों के लिए धारणा बना लेते हैं । बाद वाला हमारे हाथ में है, पहले वाला नहीं । इसलिए, दूसरों के बारे में अचानक धारणा बनाने से पहले, हमें अपने कर्मों का ध्यान रखना है और इस बात पर ध्यान एकाग्र करना है कि दूसरों के साथ हम ऐसा ही व्यवहार करें जैसा हम स्वयं के साथ चाहते हैं ।
हमारे आधुनिक समाज में, हम अधिक से अधिक अपना जीवन जीना चाहते हैं । हरेक स्वाधीनता और स्वतंत्रता को ढूँढ रहा है । हम अपने ही संसार में इतना व्यस्त हैं कि अपना जीवन ही ठीक से नहीं जी पा रहे हैं तो दूसरों के हाल में जी कर देखने का तो सवाल ही नहीं है! हमें मानवता की एकता का अहसास करने के लिए और केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि दूसरों के बारे में सोचने के लिए: दूसरों के बारे में ‘थोड़ा’ नहीं ‘सम्पूर्ण’ एकाग्र होना होगा ।
उद्देश्यपूर्ण और संतोषप्रद जीवन के लिए सहानुभूति और करूणा बहुत महत्वपूर्ण हैं । केवल दिमाग से जीने की अपेक्षा ‘दिल से’ जीना जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बना देता है । दया और करूणा की मांसपेशियों को जब हम प्रयोग करते हैं तो यह हमें मृदु और शक्तिशाली बना देता है । इस प्रकार हर स्तर पर फायदा हो जाता है; दूसरों का भी और अपना भी ।
सहानूभूति हमारे जीवन के मतभेद मिटा देती है क्योंकि हम समझने का प्रयास करते हैं कि कोई खराब व्यवहार क्यों कर रहा है । हम बातों को इतना व्यक्तिगत रूप से नहीं लेंगे । हम छोटे छोटे कारणों से रोष उत्पन्न नहीं करेंगे । हम अपने सम्बन्धों में इस बारे में और अधिक सतर्क और जागरूक होंगे कि कौन सी बात इसे सर्वाधिक प्रभावित करती है ।
हालाँकि वैसे, जहाँ सहानुभूति है, वहाँ एक दूसरे स्तर पर संवाद होता है – मन, हृदय और आत्मा के स्तर पर । इस प्रकार हम एक दूसरे के बीच के सूक्ष्म जुड़ाव को पहचान पाते हैं और एक दूसरे के जूते में वास्तविक रूप से ‘फिट’ बैठते हैं और जीवन यात्रा को साथ साथ शांति और समन्वयता से पूरा करते हैं!
अब समय है… दूसरों के प्रति थोड़ा और तालमेल बिठाने और सहानुभूति व्यक्त करने का समय निकालने का ।
 
© ‘It’s Time…’ by Aruna Ladva, BK Publications London, UK

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